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तो फिर कहाँ से पाओगे औरत की हर एक छवियाँ ?


माँ के अंदर बहन के अंदर बसी होती है लङकियाँ

गर समझो तो अमूल्य होती है लङकियाँ

घर को संजोने वाली भी होती है लङकियाँ

खुद से भी प्यारी होती है सबको अपनी बेटियाँ

घर सुना-सुना हो जाता है जब रुखसत होती है बेटियाँ

काँटे की चुभन सी बितती है एक पल और एक घङियाँ

हर किसी को प्यारी जब होती है इनकी छवियाँ

तो फिर दुनिया क्योंं कतराती है धरा पर लाने में लङकियाँ

गर युँ कतराओगे धरा पर लाने मे बेटियाँ

तो फिर कहाँ से पाओगे औरत की हर एक छवियाँ ?

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